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| मेरा गांव तेरा शहर |
ये शहर बहुत अजीब हैं तुझे पता हैं क्या
खो गया था मैं यहां तुझे खबर हैं क्या
यहां की हवा मेरे गाँव के जैसी नही हैं
फिर तेरा इस शहर में कुछ रखा हैं क्या
चल गांव बुलाता हैं तुझे पुकारती हैं तुझे माँ
वो कच्ची छते प्यारे प्यारे लोग यहां हैं क्या
तू सिर्फ तन्हा हैं यहां तेरा अपना कोई नही
तेरे सब गांव में हैं तुझे याद करते हैं तुझे वहां
जब से शहर आया हूं मैं घूट सा रहा हूं
बता मुझे यहां की हवा जहरीली हैं क्या
मैं रातभर सड़क पर था सब अलग दिखा मुझे
ना गांव की रिवायतें ना बुज़ुर्गों की पंचायत हैं यहां
बेशक़ यहां ऊँची ऊँची इमारतें बड़े बड़े किले हैं
लेकिन मेरे गांव के जैसे खुले घर यहां हैं कहां
इस शहर में पेड़ पौधे और फुलवारियां भी हैं
मगर इन पेड़ पौधों की ठण्डी हवा हैं कहां
ये शहर तुझे मुबारक हो मैं चला यहां से
एक दिन आएगा तू लौटकर यहां से वहां
लिखना तो अभी बहुत कुछ चाहता था मैं
लेकिन तेरे शहर पर लिखने के लिए हैं भी क्या
Write by zishan alam

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